Saturday, July 25, 2009

मन की भाषा ( Man Ki Bhasha )

जो राह भटके इधर गए है उन्हें हमेशा की तरह मेरा प्रणाम | और जो मित्र मेरा पहला लेख पढ़के भी यह दूसरा पढने आए है उनके साहस की मैं दाद देता हूँ | वस्तुतः स्थिति तो ऐसी है कि अब आपसे पूछा जाए कि " अब तेरा क्या होगा रे " ? पर यह केवल शालीनता के खिलाफ होगी बल्कि यह अतिथि देवो भवः कि हमारी पाश्चात्य (दुनिया गोल है) रीती कि भी घोर अवमानना होगी | सम्भव है कि आप मेरे स्वर में छिपे व्यंग्य को समझ भी गए हो | यह भी कदापि असंभव नही है कि आप अपने सर के बाल नोच रहे हो , जो कि अनुपयुक्त होगा यदि आपके बाल हमारे चौबे जी कि भांति हो | बचपन में हमारे " मेरे प्यारे वतन , मेरे उजरे चमन " की प्रेरणा वही रहे है | पर यह कहानी किसी और दिन के लिए बचाकर रखते है |

आज मेरे विषय में व्यंग्य है और विषय स्वयं भी व्यंग्य है | व्यंग्य कि तुलना किसी विद्वान् ने एक मीठी छुरी से कि है | पर भूल करे | दुनिया में और भी वस्तुएं है जिनका स्वभाव ऐसा ही होता है | उदाहरण स्वरुप कुछ मित्र ऐसे होते है जिनके विषय में कहा गया है कि

परोक्षे कार्य हन्तारम प्रत्यक्षे प्रिय वादिनम् |
वर्जयेताद्रिषम मित्रं विषकुम्भम पयोमुखम ||

जबकि व्यंग्य वास्तव में "विषकुम्भम पयोमुखम" के स्वभाव के पूर्णतः विपरीत है | व्यंग्य एक अच्छे मित्र की भाँती आंखों पर पड़े परदे हठाने का प्रयत्न करता है | और जब निद्रा गहरी हो और जड़ता सदियों की हो तब आवश्यकता आने पर यह "मीठी छुरी" ही काम आती है | व्यंग्य में वह ताकत है जो सीधे ह्रदय पर आघात कर सकती है | सदियों से जमी परतों को भेदती हुई सीधे भीतर जा सकती है | और सोचने पर विवश कर सकती है |

यद्यपि व्यंग्य के कई रूप हो सकते है , तथापि मैं आपके समक्ष इसे अपनी एक कविता के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहूँगा | इस कविता में व्यंग्य का पात्र मानव है| मानव जिसने अपने चारो तरफ़ इतनी सारी कृत्रिम जटिलताओं का निर्माण कर लिया है का आज उसे जन्म के पश्चात १३ १५ साल तो इन्हे जानने बुझने में ही लग जाता है | मानव अलग है क्योंकि वह जल की भांति पात्र में ढल नही जाता बल्कि गर्म ज्वालामुखी की भांति अपना पथ बना लेता है | किंतु इन सबमे कहीं वह अपना उद्देश्य ही भूल जाता है | यही इस कविता का सार है | इसके आगे बताना उचित होगा | क्योंकि भले ही शब्दों पर कवि का अधिकार हो , किंतु उसके अर्थ पर सम्पूर्ण अधिकार केवल पाठको का ही होता है|

मन की भाषा

एक रात खटिया पर अपनी सोने को जब मैं आया,
शीतल मधुर चंद्रिमा से उसे भीगा मैंने पाया|
पूर्णिमा कि रात्रि में विचित्र थी वह शान्ति,
मूकता के मुख से मानो जन्म ले रही हो क्रांति||

रक्तचाप का प्रभाव होगा, ह्रदय को अपने समझाया ,
भिन्न भिन्न की मधुर भावनाओ से दिल को अपने बहलाया|
आराम पाकर संतुष्ट हुए दिन भर के थके अंग,
तभी निकट के वृक्ष पर मैंने देखा एक विहंग ||

चंद्रमा से शीतल प्रकाश का लेकर मानो दान,
लौटा रही हो उसे बदले में अपना मीठा गान|
अद्भुत थी वह चिडिया, अद्भुत था उसका गीत,
संगीत नही मानो, थी किसी गंभीर दर्शन कि भीत ||

पलकों के भर को परे हटाकर जब ध्यान उसपर लगाया,
अचरज में उसे मनुष्य की वाणी में बोलता मैंने पाया|
ब्रह्माण्ड के निरंतर कोलाहल में भी वह एक ध्वनि थी स्पष्ट,
हर्ष नही वेदना थी स्वर में , निश्चित ही उसे था कुछ कष्ट ||

उसकी करूँ वाणी सुन मैं रोक न ख़ुद को पाया,
शैय्या से ही मैंने, तुंरत सवाल अपना फरमाया |
सप्त सुरों के संगम से बनते कितने मधुर आलाप ,
फिर क्यों तू इतने सुरीले स्वर में करती विरह विलाप ||

कुत्तें रोएँ बिल्लियाँ रोएँ तो समझ में आता है,
पर मधुर ध्वनी में कोई पंछी रोएँ , तो मन दुविधा में पर जाता है |
इधर उधर देखी वह चिडियां , सब सुनसान पा देखी मेरी और ,
फुदक फुदक कर पास बैठी, ज़रा भी किया शोर ||

इससे पूर्व कि मैं प्रश्न को अपने दुहराता ,
या उसके धवल तन को अपने हाथों से ही सहलाता|
बोली वह उसी रुंधे स्वर में, क्या तुम सचमुच मुझे सुन पाते हो ?
या मेरी कर्कश आवाज़ पर तुम भी अपने व्यंग्य के बाण चलते हो ?

ध्वनी है मेरी बड़ी बेसुरी, किसी को भी यह भाता है,
जग के नाना सुरों के बीच रास किसी को यह आता है |
गाती हूँ पर मूक हूँ मैं , सुनते है पर वधिर है वो ,
संसार में ऐसा कोई नही जो मेरे गीत प्रेम से सुनता हो ||

उसके दुःख में हुआ विह्वल मैं , किया जब उसने मेरा धन्यवाद ,
क्षण भर को प्रतीत हुई उसकी ध्वनि अपना ही हृदयनाद |
गगन में चौकीदारों कि जब अदला बदली हुई ,
उड़ जाने को वह विहंग तुंरत तत्पर हुई ||

मैनी पुछा नन्ही चिड़िया , नाम तो बताती जाओ ,
मित्र जब अपना माना है अपना काम तो बताती जाओ |
'मन' है मेरा नाम , यों तो मैं सदा ही गाती हूँ ,
पर जब मूंद लो अपने कानों को, असहाय मूक बन जाती हूँ ||

प्रथम किरणों की ज्योति पाकर जैसे अंधकार ने पीठ दिखाई ,
मेरे भीतर भी एक प्रकाश ने चेतना की दीप जलाई |
जैसे मिलती नही राह , यदि ह्रदय में न हो अभिलाषा ,
सुनना चाहो तभी समझोगे, मन की है ऐसी अद्भुत भाषा ||


और मेरे जो मित्र कवितायों की मूढ़ता से परे है उनके लिए एक चलचित्र का सुझाव भी है मेरे पास | इतने व्यंग्य से ओत प्रोत आधुनिक समय में बने चलचित्र कम ही होंगे| यद्यपि यह सिनेमा "Gods must be crazy" आंग्लभाषी है , किंतु मेरा यह दृढ़ विश्वास है की व्यंग्य की कोई भाषा नही होती| ठीक जैसे मन की कोई भाषा नही होती |

Friday, July 10, 2009

गाय हमारी माता है ( Guy Hamari Maata Hai )

जो भूले भटके इधर आ गए हो उन्हें मेरा सादर प्रणाम |

इससे पहले की आप इस blog के नाम को लेकर विचलित हो, लीजिये हम ही आपकी ये दुविधा दूर किए देते है |

तो जनाब किस्सा ऐसा हुआ की google indic transliteration नाम की एक चिडिया के बारे में हमने सुना इक दिन | google का एक और नायब तोहफा जिसने हिंदी में लिखना न केवल सरल कर दिया है बल्कि इसका आधार हम भारतियों का अंग्रेजी के प्रति लगाव ही है | अजी , जिस फर्राटे से रोमन लिपि में हम अपनी राष्ट्रीय भाषाओँ को लिखते है, उसे देखकर तो फिरंगी भी शर्मा जाए | chats जो हम युवा पीढी के वार्तालाप का नया माध्यम सा बना हुआ है उसमे बातें सारे लिखी तो अंग्रेजी की लिपि में जाती है पर होती सारी बाते दरअसल अपनी भाषाओँ में है |

इन्हें अँगरेज़ देखते और सोचते होंगे की किन उम्मीदों से यह भाषा बनायीं थी और अब इसका क्या कर दिया है | अब दो सौ सालो की गुलामी की खसारत देनी तो परेगी ही | तो जनाब ये तो बात ऐसी हो गयी की मुन्ने को एक बार स्कूल में निबंध लिखने के लिए कहा गया गाय पर | पर उनकी मम्मी जी ने तो उन्हें कुत्ते पे लिखने सिखाया था.... अब इतनी नन्ही सी जान करे भी तो क्या करे | तो निबंध ऐसे प्रारंभ हुआ की गाय हमारी माता है ; इसकी एक पूँछ होती है ; चार टाँगे भी होती है | एक और प्राणी की ऐसी ही चार टांगें होती है ; उसे हम कुत्ता कहते है ; शुद्ध भाषा में इसे स्वान भी कहते है ; ये मनुष्य की सबसे प्रिय मित्र होता है | और देखते ही देखते इस मूक प्राणी पर अपनी सारी भड़ास निकाल दी |

तो हम कह यह रहे थे की ऐसी हमारी कोई मंशा नहीं है | अब जितना फिर भी गलती से हो जाए उसे माफ़ कर दीजियेगा| ये भटकने की बीमारी मेरे सात पुश्तों से चली आ रही है| जाते जाते भी जा नहीं पाया | जैसा हमारा अंग्रेजी का प्रेम | तो google वालों ने सोचा की इसी का इस्तेमाल करते है , और इस google indic transliteration का ईजात किया| अब आप कहेंगे की महाशय इतने दिन कहाँ थे आप, यह कोई आसमान से आज थोड़े ही टपकी है , google की यह पेशकश भी काफी पुरानी हो गयी है| मेरे जो मित्र orkutting को अपना परम धर्म मानते है उन्हें याद होगा की यह सुविधा orkut में कई दिनों पहले ही आ गयी थी | अब यह मसला अलग है कि हमने उसके साथे सौतेला व्यवहार किया |

अब क्या कहे - स्वचालित अनुवादकों का हमारा अनुभव ही ऐसा कुछ रहा है | मसलन हमारे एक मित्र ने एक बार हमे एक अनुवाद करके बताया - अंग्रेजी से हिंदी में | शब्द था - Hot Chick | अब मेरे जो मित्र यहाँ अंग्रेजी में अक्सर वार्तालाप करते है उन्हें यह ज्ञात होगा कि यह bird flu के खिलाफ इजात कि गयी कोई नई तकनीक नहीं है| पर मिट्टी के माधव अनुवादक को कौन समझाए ; उसने बिना वक़्त बर्बाद किए अनुवाद कर दिया - गरम चूज़ा| मुझे पूरा यकीन है कि दुसरे भाषाओं में भी यह हमारी ऐसी ही खिल्ली उडाता होगा |

पर जब इस चिडिया को वास्तव में परख कर देखा तो दिल को भा गयी | blog न करने के निश्चय से हमे हटना ही पड़ा | खैर जब नाम चुनने का अवसर आया तो हमे यह नाम मुन्ने की वजह से पसंद आया या इससे जुड़े लोकोक्ति(" गाय हमारी माता है , हमको कुछ नहीं आता है ") की वजह से यह कहना मुश्किल है | शायद दोनों से प्रेरित होगा ; वैसे भी दोनों में काफी समानता है, दोनों ही परीक्षाओ से पहले हमारी स्थिति को दर्शाती है | और हमारे देश वासियों कि गौ माता के प्रति प्रेम वैसे भी अब दुनिया से छुपी नहीं है | दुनिया कि ज्यादातर सभ्यता जो beef खाती है इसे बड़े ही शंका कि दृष्टि से देखती है | और भारतियों की विश्व में कुछ ऐसी ही छवि बन गयी है |

हाल ही कुछ फिल्मों में भी इसे बड़ी उत्सुकता के साथ दर्शाया गया है | जी मैं केवल Outsourced जैसी फिल्मों का ज़िक्र नहीं कर रहा है , बल्कि Delhi6 की उस scene की भी बात कर रहा हूँ | कहीं तो भारतियों को भी यह छवि अब खटकने लगी है | पर मेरा उद्देश्य इसके विषय में आपको जागरूक करना कतई नहीं है | अब तक तो मेरी बातें करनी की शैली से परिचित हो ही गए होंगे और समझ ही गए होंगे , कि सार बस इतना है कि अगर हिंदी में कोई blog लिखी जाए तो इस नाम से उचित और क्या हो |

खैर अगली बार और किसी आसान विषय पर बात करेंगे , जिसे इतने विस्तार से समझाना न पड़े | और अगर कुछ भूल चूक हो गयी हो तो क्षमा कीजियेगा | अब तो आपको ज्ञात हो ही गया है कि

गाय हमारी माता है
हमको कुछ नहीं आता है