Friday, December 18, 2009

भीतर और बाहर

काफी दिनों के पश्चात आज फिर कलम ने अपनी शिथिलता त्यागी है | अब बेचारा कलम भी क्या करे? कलम बस स्याही से ही तो नहीं चलती | जब तक भावनाएँ स्याही की गंगा में कलम से बह निकले, तब तक कोरे पन्ने पर कलम क्या हल जोते और क्या फसल उगाये| ये बात अलग है की इसबार काफी लम्बे अरसे के लिए सूखा पड़ा था|

अब भावनाओं की बात छिड़ी है तो जनाब कहना चाहूँगा कि यह भी कुछ अजीब चिड़िया होती है| कब किधर से उड़के जाएँ कहना मुश्किल है| आज जिस विषय पर लिखने जा रहा हूँ ये भी यूँ अचानक ही दिमाग में गयी थी|यह हाल ही में देखे एक चलचित्र का प्रभाव था या बरसो पहले की भूली बिसरी एक कहानी का, यह निश्चित कर पाना मुश्किल है | संभव है कि दोनों कि मिलीभगत हो | गौर फरमायें कहानी कुछ ऐसी शुरू होती है|

एक दूर देश के गाँव में दो मित्र रहते थे | दोनों में पक्की दोस्ती थी -एक दुसरे के सुख दुःख के साथी थे| प्रायः ही एक मित्र दुसरे के घर पर शाम को जाता और फिर वे घंटो तक गप्पे लड़ाते रहते |

ऐसे ही एक शनिवार की शाम को भोजन के पश्चात दोनों आपस में बातें कर रहे थे | एक बात से दूसरी छिड़ी और दुसरे से तीसरी| ऐसे ही जब बातों का दौर चल निकला तो जो दोस्त उस दिन का मेज़बान था उसके मुख से अनायास ही यह निकल पड़ा, " पर जो भीतर है वह बाहर है, और जो बाहर वह भीत |" इस वाक्य के प्रभाव से वह मेहमान मित्र क्षण भर के लिए अचरज में शांत तो हो गया | पर जब कुछ देर बाद उसने शब्दों को टटोल कर देखा तो एक अट्टहास के साथ बोला , " ऐसे ही कुछ भी बोलने से यहाँ दाल नहीं गलने वाली| हमे यह वकालत चने खाकर नहीं मिली है | ये कैसी ऊटपटांग बाते कर रहे हो?"

दूसरा मित्र बड़ा शरीफ था और वकीलों के इस बड़बोलेपन से पूरी तरह से अज्ञात| फलतः ऐसे जवाब से कुछ देर के लिए वह भौचक्का रह गया | जब साहस जुटाया तो फिर बोलना लगा कि," मेरा अभिप्राय यह है कि भीतर-बाहर कुछ नहीं होता जो भीतर है वह बाहर भी हो सकती है , और जो बाहर है वह भीतर|" मेहमान मित्र इतनी आसानी से उसकी बातों में आने वालों में से नहीं था;बोला, "अच्छा अभी मैं इस घर को बाहर से बंद कर दूं, तो तू भीतर हुआ या बाहर?" इतना कहके वह फिर से हंसने लगा | इससे उस मित्र की दुविधा दुगुनी हो गयी | अंततः वह बोला, " मैं तेरी तरह वाकपटु तो नहीं हूँ, पर यदि मुझे कुछ समय दे तो मैं अपने कथन को सिद्ध कर सकता हूँ |" मेहमान ने मन में सोचा की अब हाथ कंगन को आरसी क्या ? पर अपने मित्र की दुविधा पर उसे तरस भी आ रहा था | सो वह राज़ी हो गया|

तब मेज़बान मित्र अपने कक्ष में गया और सुन्दर सी एक दवात हाथ में पीछे छुपाते हुए वापस आया | दवात को आँखों से ओझल रखते हुए वह बोला, " पर एक शर्त है की तुझे मेरी बातों के अनुरूप चलना परेगा| " मित्र ने सोचा अब ये भला मुझे कौन सा राजा हरिश्चंद्र बनने को कहेगा | तो वह ये शर्त भी मान गया | इतना सुनते ही मेज़बान मित्र दवात को सामने लाया और व्यंग्य से बोला, " तू आज इस दवात को पहली बार देख रहा है | तो अपने तीक्ष्ण अवलोकन से यह बता कि यह दवात तेरे भीतर है या बाहर ? " "बाहर", तड़ाक से जवाब आया | "तो अब मेरी दूसरी शर्त यह है कि आज से जब तक मैं न कहूं तू इस दवात को नहीं देख सकता ........... और न ही तू मेरे घर आ सकता है | यही मेरी दूसरी और आखरी शर्त है |"

अब दुसरे मित्र का चेहरा सुख गया | बोला," किन्तु इस मामूली सी दवात की वजह से हमारी मित्रता में फूट डल जाए ? क्या पागलपन है ये?" पर मेज़बान के चेहरा की एक भी पेशी न हिली| उसने उसी स्वर में जवाब दिया," सोच ले | तुने कहा था की तू मेरे सारे शर्त मानेगा |" इस तीर ने अपने कदाचित स्थान पर वार किया और मेहमान के अन्दर के वकील ने उसे धिक्कारा | इच्छा न होते हुए भी वह इस शर्त को भी मान गाया | उस रात जब दो मित्र अलग हुए तो एक अजीब से ख़ामोशी थी | परस्पर को अलविदा कहते हुए उनके स्वरों में वह उल्लास जाने कहाँ लुप्त हो गया था |

ऐसे ही दो दिन बीत गए | जब वकील का दंभ बह निकला तो उसे अपने मित्र की याद आने लगी | रास्ते में मंडी से कुछ आम खरीदते हुए वह अपने मित्र के घर पंहुचा | हलके से दरवाज़ा खटखटाया| पर कोई नहीं आया | उसने सोचा 'सो रहा होगा'| औ जोर से कुंडी बजाई | ऐसे ही आधा घंटा हो गया , पर किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला | उसे अब यकीन होने लगा था की उसका मित्र वाकई अपने वाक्य पर अडिग था | जब बाहर अँधेरा होने लगा तो उसने घर वापस जाना ही उचित समझा | उस रात वकील को नींद नहीं आई | वह सोचने लगा की कहीं उसके मित्र ने इसका बहाने लेते हुए उससे मित्रता तो नहीं तोड़ी थी ? पर फिर उसे अपने मित्र की सरलता याद आई | इतने सालों के इन अनुभवी आँखों को धोखा नहीं हो सकता | निश्चय ही कोई और कारण है | फिर उसे दवात की याद आई जो इस सारे फसाद की जड़ थी , और वह उसे कोसने लगा | उसने निश्चय किया की वह अगले दिन फिर जाएगा अपने मित्र के घर और उससे इसका कारण पूछेगा|

परन्तु जब लगातार क दिन जाने पर भी उस घर के दरवाज़े उसके लिए नहीं खुले तो वह अन्दर ही अन्दर ही अपने दुःख को पी गया | उसके काम पर भी इसका प्रभाव पड़ा | अब वह उस एकाग्रता से काम भी नहीं कर पाता था | अपने भाग्य पर उसे स्वयं हँसी आती थी , कि कैसे एक मामूली से दवात की वजह से उसका जिगरी दोस्त उससे बिछर गया था | मन ही मन वह उस दवात को कोसता रहता था | उसके सपनो में वह दवात एक विशालकाय नदी का रूप धर लेती जिसके दोनों तटों पर दो मित्र चाहकर कर भी एक दुसरे से मिल नहीं सकते थे | पर सपनो में कम से कम वह अपने मित्र को दुसरे पार से देख तो पाता था | ऐसे ही हफ्ते महीनो में बदल गए | अब भी हफ्ते में एक बार वह अपने मित्र के घर तक जाता ज़रूर था | पर अब दरवाज़े पर खटखटाना छोर दिया था | यहाँ आना उसे अच्छा लगता था | पुराने दिनों की यादें जो थी यहाँ | किन्तु इन यादों के साथ उस शाम की वो यादें भी आ जाती और उस दवात की - जिसने दो मित्रों के बीच में रेखा खीच दी थी |

उस घटना को अब छह महीने हो चले थे | एक शनिवार की शाम को वह उस घर के बाहर टहल रहा था | जब अँधेरा होने लगा तो वह वापस जाने के लिए मुड़ा| तब अचानक ही मानो उसके कानों ने कहीं से एक दरवाज़े की चरमराहट सुनी | यही आवाज़ सुनने को तो उसके कान तरस गए थे | पर फिर उसने सोचा के अवश्य ही यह मेरा भ्रम होगा | तभी साँझ के अँधेरे में किसी घर से आते हुए रौशनी ने उसके पथ को प्रज्वलित कर दिया | रोमांच से वह शिहर उठा | मुड़के देखा उसका मित्र दरवाज़े पर लालटेन लिए खड़ा था | उसने अन्दर आने का इशारा किया | वह मंत्र मुग्ध सा पीछे पीछे गया और अन्दर प्रविष्ठ हो गया | अन्दर अपने मित्र की जो हालत देखि तो उसके आसुओं का बांध टूट गया | लम्बी दाढ़ी , कंधे पर एक चादर और उसकी दुर्बल काया ने सबकुछ स्पष्ट कर दिया था | उस एक क्षण में ही महीनों का क्रोध, रोष सब धुल गया | उसका मित्र भी उसके दुःख में कितना विह्वल हो गया था |

किन्तु उसके मन में फिर से वही प्रश्न घर करने लगा जिसने इन महीनो में उसकी चैन छीन ली थी | इतने कष्ट सहने का कारण क्या था ? यह त्याग वो किसके लिए कर रहे थे ? फिर उसे उस दवात का ध्यान आया और वह क्रोध से भर गया | तभी उसके मित्र ने चादर के भीतर से एक दवात निकलकर आगे किया | अपने क्रोध में अँधा उसने आव देखा ताव | हाथ से दवात छीनकर ज़मीन पर पुरे जोर से पटक दिया | मिटटी की वह दवात कई टुकरो में फर्श पर बिखर गयी | ऐसे लगा मानो किसी ने दोनों के बीच से एक ऊंची दीवार गिरा दी हो | अब तक जो दाढ़ी वाला आदमी कमरे के बीच एक बुत की तरह खड़ा था, अपने चादर को एक ओर फेंकते हुए अपने मित्र के गले से लिपट गया | बरसो की सुखी नदी में मानो अचानक बाढ़ गयी हो | रुंधे स्वर में वकील बोला," पर यह सब करने की क्या ज़रुरत थी पगले ?" घनी दाढ़ी की बीच एक मुस्कान दिखी और उसने जवाब दिया ," जो दवात तेरे बाहर था वह अब तेरे भीतर है |" अश्रुओं की एक और बौछार से वकील ने अपनी हार मानी और ऐसा लग रहा था मानो बरसो के दो बिछरे हुए यार आपस में मिल रहे थे | निरंतर बहती उस गंगा में सारे क्लेश धुलते जा रहे थे |

Saturday, July 25, 2009

मन की भाषा ( Man Ki Bhasha )

जो राह भटके इधर गए है उन्हें हमेशा की तरह मेरा प्रणाम | और जो मित्र मेरा पहला लेख पढ़के भी यह दूसरा पढने आए है उनके साहस की मैं दाद देता हूँ | वस्तुतः स्थिति तो ऐसी है कि अब आपसे पूछा जाए कि " अब तेरा क्या होगा रे " ? पर यह केवल शालीनता के खिलाफ होगी बल्कि यह अतिथि देवो भवः कि हमारी पाश्चात्य (दुनिया गोल है) रीती कि भी घोर अवमानना होगी | सम्भव है कि आप मेरे स्वर में छिपे व्यंग्य को समझ भी गए हो | यह भी कदापि असंभव नही है कि आप अपने सर के बाल नोच रहे हो , जो कि अनुपयुक्त होगा यदि आपके बाल हमारे चौबे जी कि भांति हो | बचपन में हमारे " मेरे प्यारे वतन , मेरे उजरे चमन " की प्रेरणा वही रहे है | पर यह कहानी किसी और दिन के लिए बचाकर रखते है |

आज मेरे विषय में व्यंग्य है और विषय स्वयं भी व्यंग्य है | व्यंग्य कि तुलना किसी विद्वान् ने एक मीठी छुरी से कि है | पर भूल करे | दुनिया में और भी वस्तुएं है जिनका स्वभाव ऐसा ही होता है | उदाहरण स्वरुप कुछ मित्र ऐसे होते है जिनके विषय में कहा गया है कि

परोक्षे कार्य हन्तारम प्रत्यक्षे प्रिय वादिनम् |
वर्जयेताद्रिषम मित्रं विषकुम्भम पयोमुखम ||

जबकि व्यंग्य वास्तव में "विषकुम्भम पयोमुखम" के स्वभाव के पूर्णतः विपरीत है | व्यंग्य एक अच्छे मित्र की भाँती आंखों पर पड़े परदे हठाने का प्रयत्न करता है | और जब निद्रा गहरी हो और जड़ता सदियों की हो तब आवश्यकता आने पर यह "मीठी छुरी" ही काम आती है | व्यंग्य में वह ताकत है जो सीधे ह्रदय पर आघात कर सकती है | सदियों से जमी परतों को भेदती हुई सीधे भीतर जा सकती है | और सोचने पर विवश कर सकती है |

यद्यपि व्यंग्य के कई रूप हो सकते है , तथापि मैं आपके समक्ष इसे अपनी एक कविता के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहूँगा | इस कविता में व्यंग्य का पात्र मानव है| मानव जिसने अपने चारो तरफ़ इतनी सारी कृत्रिम जटिलताओं का निर्माण कर लिया है का आज उसे जन्म के पश्चात १३ १५ साल तो इन्हे जानने बुझने में ही लग जाता है | मानव अलग है क्योंकि वह जल की भांति पात्र में ढल नही जाता बल्कि गर्म ज्वालामुखी की भांति अपना पथ बना लेता है | किंतु इन सबमे कहीं वह अपना उद्देश्य ही भूल जाता है | यही इस कविता का सार है | इसके आगे बताना उचित होगा | क्योंकि भले ही शब्दों पर कवि का अधिकार हो , किंतु उसके अर्थ पर सम्पूर्ण अधिकार केवल पाठको का ही होता है|

मन की भाषा

एक रात खटिया पर अपनी सोने को जब मैं आया,
शीतल मधुर चंद्रिमा से उसे भीगा मैंने पाया|
पूर्णिमा कि रात्रि में विचित्र थी वह शान्ति,
मूकता के मुख से मानो जन्म ले रही हो क्रांति||

रक्तचाप का प्रभाव होगा, ह्रदय को अपने समझाया ,
भिन्न भिन्न की मधुर भावनाओ से दिल को अपने बहलाया|
आराम पाकर संतुष्ट हुए दिन भर के थके अंग,
तभी निकट के वृक्ष पर मैंने देखा एक विहंग ||

चंद्रमा से शीतल प्रकाश का लेकर मानो दान,
लौटा रही हो उसे बदले में अपना मीठा गान|
अद्भुत थी वह चिडिया, अद्भुत था उसका गीत,
संगीत नही मानो, थी किसी गंभीर दर्शन कि भीत ||

पलकों के भर को परे हटाकर जब ध्यान उसपर लगाया,
अचरज में उसे मनुष्य की वाणी में बोलता मैंने पाया|
ब्रह्माण्ड के निरंतर कोलाहल में भी वह एक ध्वनि थी स्पष्ट,
हर्ष नही वेदना थी स्वर में , निश्चित ही उसे था कुछ कष्ट ||

उसकी करूँ वाणी सुन मैं रोक न ख़ुद को पाया,
शैय्या से ही मैंने, तुंरत सवाल अपना फरमाया |
सप्त सुरों के संगम से बनते कितने मधुर आलाप ,
फिर क्यों तू इतने सुरीले स्वर में करती विरह विलाप ||

कुत्तें रोएँ बिल्लियाँ रोएँ तो समझ में आता है,
पर मधुर ध्वनी में कोई पंछी रोएँ , तो मन दुविधा में पर जाता है |
इधर उधर देखी वह चिडियां , सब सुनसान पा देखी मेरी और ,
फुदक फुदक कर पास बैठी, ज़रा भी किया शोर ||

इससे पूर्व कि मैं प्रश्न को अपने दुहराता ,
या उसके धवल तन को अपने हाथों से ही सहलाता|
बोली वह उसी रुंधे स्वर में, क्या तुम सचमुच मुझे सुन पाते हो ?
या मेरी कर्कश आवाज़ पर तुम भी अपने व्यंग्य के बाण चलते हो ?

ध्वनी है मेरी बड़ी बेसुरी, किसी को भी यह भाता है,
जग के नाना सुरों के बीच रास किसी को यह आता है |
गाती हूँ पर मूक हूँ मैं , सुनते है पर वधिर है वो ,
संसार में ऐसा कोई नही जो मेरे गीत प्रेम से सुनता हो ||

उसके दुःख में हुआ विह्वल मैं , किया जब उसने मेरा धन्यवाद ,
क्षण भर को प्रतीत हुई उसकी ध्वनि अपना ही हृदयनाद |
गगन में चौकीदारों कि जब अदला बदली हुई ,
उड़ जाने को वह विहंग तुंरत तत्पर हुई ||

मैनी पुछा नन्ही चिड़िया , नाम तो बताती जाओ ,
मित्र जब अपना माना है अपना काम तो बताती जाओ |
'मन' है मेरा नाम , यों तो मैं सदा ही गाती हूँ ,
पर जब मूंद लो अपने कानों को, असहाय मूक बन जाती हूँ ||

प्रथम किरणों की ज्योति पाकर जैसे अंधकार ने पीठ दिखाई ,
मेरे भीतर भी एक प्रकाश ने चेतना की दीप जलाई |
जैसे मिलती नही राह , यदि ह्रदय में न हो अभिलाषा ,
सुनना चाहो तभी समझोगे, मन की है ऐसी अद्भुत भाषा ||


और मेरे जो मित्र कवितायों की मूढ़ता से परे है उनके लिए एक चलचित्र का सुझाव भी है मेरे पास | इतने व्यंग्य से ओत प्रोत आधुनिक समय में बने चलचित्र कम ही होंगे| यद्यपि यह सिनेमा "Gods must be crazy" आंग्लभाषी है , किंतु मेरा यह दृढ़ विश्वास है की व्यंग्य की कोई भाषा नही होती| ठीक जैसे मन की कोई भाषा नही होती |

Friday, July 10, 2009

गाय हमारी माता है ( Guy Hamari Maata Hai )

जो भूले भटके इधर आ गए हो उन्हें मेरा सादर प्रणाम |

इससे पहले की आप इस blog के नाम को लेकर विचलित हो, लीजिये हम ही आपकी ये दुविधा दूर किए देते है |

तो जनाब किस्सा ऐसा हुआ की google indic transliteration नाम की एक चिडिया के बारे में हमने सुना इक दिन | google का एक और नायब तोहफा जिसने हिंदी में लिखना न केवल सरल कर दिया है बल्कि इसका आधार हम भारतियों का अंग्रेजी के प्रति लगाव ही है | अजी , जिस फर्राटे से रोमन लिपि में हम अपनी राष्ट्रीय भाषाओँ को लिखते है, उसे देखकर तो फिरंगी भी शर्मा जाए | chats जो हम युवा पीढी के वार्तालाप का नया माध्यम सा बना हुआ है उसमे बातें सारे लिखी तो अंग्रेजी की लिपि में जाती है पर होती सारी बाते दरअसल अपनी भाषाओँ में है |

इन्हें अँगरेज़ देखते और सोचते होंगे की किन उम्मीदों से यह भाषा बनायीं थी और अब इसका क्या कर दिया है | अब दो सौ सालो की गुलामी की खसारत देनी तो परेगी ही | तो जनाब ये तो बात ऐसी हो गयी की मुन्ने को एक बार स्कूल में निबंध लिखने के लिए कहा गया गाय पर | पर उनकी मम्मी जी ने तो उन्हें कुत्ते पे लिखने सिखाया था.... अब इतनी नन्ही सी जान करे भी तो क्या करे | तो निबंध ऐसे प्रारंभ हुआ की गाय हमारी माता है ; इसकी एक पूँछ होती है ; चार टाँगे भी होती है | एक और प्राणी की ऐसी ही चार टांगें होती है ; उसे हम कुत्ता कहते है ; शुद्ध भाषा में इसे स्वान भी कहते है ; ये मनुष्य की सबसे प्रिय मित्र होता है | और देखते ही देखते इस मूक प्राणी पर अपनी सारी भड़ास निकाल दी |

तो हम कह यह रहे थे की ऐसी हमारी कोई मंशा नहीं है | अब जितना फिर भी गलती से हो जाए उसे माफ़ कर दीजियेगा| ये भटकने की बीमारी मेरे सात पुश्तों से चली आ रही है| जाते जाते भी जा नहीं पाया | जैसा हमारा अंग्रेजी का प्रेम | तो google वालों ने सोचा की इसी का इस्तेमाल करते है , और इस google indic transliteration का ईजात किया| अब आप कहेंगे की महाशय इतने दिन कहाँ थे आप, यह कोई आसमान से आज थोड़े ही टपकी है , google की यह पेशकश भी काफी पुरानी हो गयी है| मेरे जो मित्र orkutting को अपना परम धर्म मानते है उन्हें याद होगा की यह सुविधा orkut में कई दिनों पहले ही आ गयी थी | अब यह मसला अलग है कि हमने उसके साथे सौतेला व्यवहार किया |

अब क्या कहे - स्वचालित अनुवादकों का हमारा अनुभव ही ऐसा कुछ रहा है | मसलन हमारे एक मित्र ने एक बार हमे एक अनुवाद करके बताया - अंग्रेजी से हिंदी में | शब्द था - Hot Chick | अब मेरे जो मित्र यहाँ अंग्रेजी में अक्सर वार्तालाप करते है उन्हें यह ज्ञात होगा कि यह bird flu के खिलाफ इजात कि गयी कोई नई तकनीक नहीं है| पर मिट्टी के माधव अनुवादक को कौन समझाए ; उसने बिना वक़्त बर्बाद किए अनुवाद कर दिया - गरम चूज़ा| मुझे पूरा यकीन है कि दुसरे भाषाओं में भी यह हमारी ऐसी ही खिल्ली उडाता होगा |

पर जब इस चिडिया को वास्तव में परख कर देखा तो दिल को भा गयी | blog न करने के निश्चय से हमे हटना ही पड़ा | खैर जब नाम चुनने का अवसर आया तो हमे यह नाम मुन्ने की वजह से पसंद आया या इससे जुड़े लोकोक्ति(" गाय हमारी माता है , हमको कुछ नहीं आता है ") की वजह से यह कहना मुश्किल है | शायद दोनों से प्रेरित होगा ; वैसे भी दोनों में काफी समानता है, दोनों ही परीक्षाओ से पहले हमारी स्थिति को दर्शाती है | और हमारे देश वासियों कि गौ माता के प्रति प्रेम वैसे भी अब दुनिया से छुपी नहीं है | दुनिया कि ज्यादातर सभ्यता जो beef खाती है इसे बड़े ही शंका कि दृष्टि से देखती है | और भारतियों की विश्व में कुछ ऐसी ही छवि बन गयी है |

हाल ही कुछ फिल्मों में भी इसे बड़ी उत्सुकता के साथ दर्शाया गया है | जी मैं केवल Outsourced जैसी फिल्मों का ज़िक्र नहीं कर रहा है , बल्कि Delhi6 की उस scene की भी बात कर रहा हूँ | कहीं तो भारतियों को भी यह छवि अब खटकने लगी है | पर मेरा उद्देश्य इसके विषय में आपको जागरूक करना कतई नहीं है | अब तक तो मेरी बातें करनी की शैली से परिचित हो ही गए होंगे और समझ ही गए होंगे , कि सार बस इतना है कि अगर हिंदी में कोई blog लिखी जाए तो इस नाम से उचित और क्या हो |

खैर अगली बार और किसी आसान विषय पर बात करेंगे , जिसे इतने विस्तार से समझाना न पड़े | और अगर कुछ भूल चूक हो गयी हो तो क्षमा कीजियेगा | अब तो आपको ज्ञात हो ही गया है कि

गाय हमारी माता है
हमको कुछ नहीं आता है