अब भावनाओं की बात छिड़ी है तो जनाब कहना चाहूँगा कि यह भी कुछ अजीब चिड़िया होती है| कब किधर से उड़के आ जाएँ कहना मुश्किल है| आज जिस विषय पर लिखने जा रहा हूँ ये भी यूँ अचानक ही दिमाग में आ गयी थी|यह हाल ही में देखे एक चलचित्र का प्रभाव था या बरसो पहले की भूली बिसरी एक कहानी का, यह निश्चित कर पाना मुश्किल है | संभव है कि दोनों कि मिलीभगत हो | गौर फरमायें कहानी कुछ ऐसी शुरू होती है|
एक दूर देश के गाँव में दो मित्र रहते थे | दोनों में पक्की दोस्ती थी -एक दुसरे के सुख दुःख के साथी थे| प्रायः ही एक मित्र दुसरे के घर पर शाम को जाता और फिर वे घंटो तक गप्पे लड़ाते रहते |
ऐसे ही एक शनिवार की शाम को भोजन के पश्चात दोनों आपस में बातें कर रहे थे | एक बात से दूसरी छिड़ी और दुसरे से तीसरी| ऐसे ही जब बातों का दौर चल निकला तो जो दोस्त उस दिन का मेज़बान था उसके मुख से अनायास ही यह निकल पड़ा, " पर जो भीतर है वह बाहर है, और जो बाहर वह भीतर |" इस वाक्य के प्रभाव से वह मेहमान मित्र क्षण भर के लिए अचरज में शांत तो हो गया | पर जब कुछ देर बाद उसने शब्दों को टटोल कर देखा तो एक अट्टहास के साथ बोला , " ऐसे ही कुछ भी बोलने से यहाँ दाल नहीं गलने वाली| हमे यह वकालत चने खाकर नहीं मिली है | ये कैसी ऊटपटांग बाते कर रहे हो?"
दूसरा मित्र बड़ा शरीफ था और वकीलों के इस बड़बोलेपन से पूरी तरह से अज्ञात| फलतः ऐसे जवाब से कुछ देर के लिए वह भौचक्का रह गया | जब साहस जुटाया तो फिर बोलना लगा कि," मेरा अभिप्राय यह है कि भीतर-बाहर कुछ नहीं होता। जो भीतर है वह बाहर भी हो सकती है , और जो बाहर है वह भीतर|" मेहमान मित्र इतनी आसानी से उसकी बातों में आने वालों में से नहीं था;बोला, "अच्छा अभी मैं इस घर को बाहर से बंद कर दूं, तो तू भीतर हुआ या बाहर?" इतना कहके वह फिर से हंसने लगा | इससे उस मित्र की दुविधा दुगुनी हो गयी | अंततः वह बोला, " मैं तेरी तरह वाकपटु तो नहीं हूँ, पर यदि मुझे कुछ समय दे तो मैं अपने कथन को सिद्ध कर सकता हूँ |" मेहमान ने मन में सोचा की अब हाथ कंगन को आरसी क्या ? पर अपने मित्र की दुविधा पर उसे तरस भी आ रहा था | सो वह राज़ी हो गया|
तब मेज़बान मित्र अपने कक्ष में गया और सुन्दर सी एक दवात हाथ में पीछे छुपाते हुए वापस आया | दवात को आँखों से ओझल रखते हुए वह बोला, " पर एक शर्त है की तुझे मेरी बातों के अनुरूप चलना परेगा| " मित्र ने सोचा अब ये भला मुझे कौन सा राजा हरिश्चंद्र बनने को कहेगा | तो वह ये शर्त भी मान गया | इतना सुनते ही मेज़बान मित्र दवात को सामने लाया और व्यंग्य से बोला, " तू आज इस दवात को पहली बार देख रहा है | तो अपने तीक्ष्ण अवलोकन से यह बता कि यह दवात तेरे भीतर है या बाहर ? " "बाहर", तड़ाक से जवाब आया | "तो अब मेरी दूसरी शर्त यह है कि आज से जब तक मैं न कहूं तू इस दवात को नहीं देख सकता ........... और न ही तू मेरे घर आ सकता है | यही मेरी दूसरी और आखरी शर्त है |"
अब दुसरे मित्र का चेहरा सुख गया | बोला," किन्तु इस मामूली सी दवात की वजह से हमारी मित्रता में फूट डल जाए ? क्या पागलपन है ये?" पर मेज़बान के चेहरा की एक भी पेशी न हिली| उसने उसी स्वर में जवाब दिया," सोच ले | तुने कहा था की तू मेरे सारे शर्त मानेगा |" इस तीर ने अपने कदाचित स्थान पर वार किया और मेहमान के अन्दर के वकील ने उसे धिक्कारा | इच्छा न होते हुए भी वह इस शर्त को भी मान गाया | उस रात जब दो मित्र अलग हुए तो एक अजीब से ख़ामोशी थी | परस्पर को अलविदा कहते हुए उनके स्वरों में वह उल्लास जाने कहाँ लुप्त हो गया था |
ऐसे ही दो दिन बीत गए | जब वकील का दंभ बह निकला तो उसे अपने मित्र की याद आने लगी | रास्ते में मंडी से कुछ आम खरीदते हुए वह अपने मित्र के घर पंहुचा | हलके से दरवाज़ा खटखटाया| पर कोई नहीं आया | उसने सोचा 'सो रहा होगा'| और जोर से कुंडी बजाई | ऐसे ही आधा घंटा हो गया , पर किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला | उसे अब यकीन होने लगा था की उसका मित्र वाकई अपने वाक्य पर अडिग था | जब बाहर अँधेरा होने लगा तो उसने घर वापस जाना ही उचित समझा | उस रात वकील को नींद नहीं आई | वह सोचने लगा की कहीं उसके मित्र ने इसका बहाने लेते हुए उससे मित्रता तो नहीं तोड़ी थी ? पर फिर उसे अपने मित्र की सरलता याद आई | इतने सालों के इन अनुभवी आँखों को धोखा नहीं हो सकता | निश्चय ही कोई और कारण है | फिर उसे दवात की याद आई जो इस सारे फसाद की जड़ थी , और वह उसे कोसने लगा | उसने निश्चय किया की वह अगले दिन फिर जाएगा अपने मित्र के घर और उससे इसका कारण पूछेगा|
परन्तु जब लगातार कई दिन जाने पर भी उस घर के दरवाज़े उसके लिए नहीं खुले तो वह अन्दर ही अन्दर ही अपने दुःख को पी गया | उसके काम पर भी इसका प्रभाव पड़ा | अब वह उस एकाग्रता से काम भी नहीं कर पाता था | अपने भाग्य पर उसे स्वयं हँसी आती थी , कि कैसे एक मामूली से दवात की वजह से उसका जिगरी दोस्त उससे बिछर गया था | मन ही मन वह उस दवात को कोसता रहता था | उसके सपनो में वह दवात एक विशालकाय नदी का रूप धर लेती जिसके दोनों तटों पर दो मित्र चाहकर कर भी एक दुसरे से मिल नहीं सकते थे | पर सपनो में कम से कम वह अपने मित्र को दुसरे पार से देख तो पाता था | ऐसे ही हफ्ते महीनो में बदल गए | अब भी हफ्ते में एक बार वह अपने मित्र के घर तक जाता ज़रूर था | पर अब दरवाज़े पर खटखटाना छोर दिया था | यहाँ आना उसे अच्छा लगता था | पुराने दिनों की यादें जो थी यहाँ | किन्तु इन यादों के साथ उस शाम की वो यादें भी आ जाती और उस दवात की - जिसने दो मित्रों के बीच में रेखा खीच दी थी |
उस घटना को अब छह महीने हो चले थे | एक शनिवार की शाम को वह उस घर के बाहर टहल रहा था | जब अँधेरा होने लगा तो वह वापस जाने के लिए मुड़ा| तब अचानक ही मानो उसके कानों ने कहीं से एक दरवाज़े की चरमराहट सुनी | यही आवाज़ सुनने को तो उसके कान तरस गए थे | पर फिर उसने सोचा के अवश्य ही यह मेरा भ्रम होगा | तभी साँझ के अँधेरे में किसी घर से आते हुए रौशनी ने उसके पथ को प्रज्वलित कर दिया | रोमांच से वह शिहर उठा | मुड़के देखा उसका मित्र दरवाज़े पर लालटेन लिए खड़ा था | उसने अन्दर आने का इशारा किया | वह मंत्र मुग्ध सा पीछे पीछे गया और अन्दर प्रविष्ठ हो गया | अन्दर अपने मित्र की जो हालत देखि तो उसके आसुओं का बांध टूट गया | लम्बी दाढ़ी , कंधे पर एक चादर और उसकी दुर्बल काया ने सबकुछ स्पष्ट कर दिया था | उस एक क्षण में ही महीनों का क्रोध, रोष सब धुल गया | उसका मित्र भी उसके दुःख में कितना विह्वल हो गया था |
किन्तु उसके मन में फिर से वही प्रश्न घर करने लगा जिसने इन महीनो में उसकी चैन छीन ली थी | इतने कष्ट सहने का कारण क्या था ? यह त्याग वो किसके लिए कर रहे थे ? फिर उसे उस दवात का ध्यान आया और वह क्रोध से भर गया | तभी उसके मित्र ने चादर के भीतर से एक दवात निकलकर आगे किया | अपने क्रोध में अँधा उसने न आव देखा न ताव | हाथ से दवात छीनकर ज़मीन पर पुरे जोर से पटक दिया | मिटटी की वह दवात कई टुकरो में फर्श पर बिखर गयी | ऐसे लगा मानो किसी ने दोनों के बीच से एक ऊंची दीवार गिरा दी हो | अब तक जो दाढ़ी वाला आदमी कमरे के बीच एक बुत की तरह खड़ा था, अपने चादर को एक ओर फेंकते हुए अपने मित्र के गले से लिपट गया | बरसो की सुखी नदी में मानो अचानक बाढ़ आ गयी हो | रुंधे स्वर में वकील बोला," पर यह सब करने की क्या ज़रुरत थी पगले ?" घनी दाढ़ी की बीच एक मुस्कान दिखी और उसने जवाब दिया ," जो दवात तेरे बाहर था वह अब तेरे भीतर है |" अश्रुओं की एक और बौछार से वकील ने अपनी हार मानी और ऐसा लग रहा था मानो बरसो के दो बिछरे हुए यार आपस में मिल रहे थे | निरंतर बहती उस गंगा में सारे क्लेश धुलते जा रहे थे |